जय सनातन
हिंदू धर्मशास्त्रों, विशेषकर वैष्णव संप्रदाय और श्रीमद्भागवतम् के अनुसार, मूल रूप से भगवान विष्णु एक ही हैं (परम भगवान), लेकिन सृष्टि के संचालन और विस्तार के लिए उनके तीन प्रमुख रूप बताए गए हैं। इन्हें 'पुरुष अवतार' कहा जाता है।
यहाँ इसका विवरण दिया गया है:
सृष्टि की रचना और पालन के लिए विष्णु तीन रूपों में विस्तार करते हैं:
महाविष्णु (कारणोदकशायी विष्णु): ये आध्यात्मिक आकाश (कारण सागर) में लेटे हुए हैं। कहा जाता है कि जब ये सांस छोड़ते हैं, तो इनके रोम छिद्रों से करोड़ों ब्रह्मांड निकलते हैं और जब सांस अंदर लेते हैं, तो सब वापस उनमें समा जाते हैं।
गर्भोदकशायी विष्णु: ये महाविष्णु का विस्तार हैं। ये प्रत्येक ब्रह्मांड के अंदर प्रवेश करते हैं और शेषनाग की शैया पर लेटे होते हैं। इनकी नाभि से कमल निकलता है जिस पर ब्रह्मा जी का जन्म होता है।
क्षीरोदकशायी विष्णु: यह तीसरा रूप है जो 'क्षीर सागर' (दूध के सागर) में निवास करता है। यही वह रूप है जो परमात्मा (Supersoul) के रूप में हर जीव के हृदय में और सृष्टि के कण-कण में विद्यमान है।
इसके अलावा, आध्यात्मिक जगत (वैकुंठ) में भगवान विष्णु अपने चार प्राथमिक विस्तारों में भी पूजे जाते हैं, जिसे 'चतुर्व्यूह' कहते हैं:
वासुदेव
संकर्षण
प्रद्युम्न
अनिरुद्ध
मूर्ति विज्ञान (Iconography) के अनुसार, भगवान विष्णु के चार हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म (कमल) के अलग-अलग क्रम (arrangements) के आधार पर उनके 24 रूप माने जाते हैं। जैसे:
केशव
नारायण
माधव
गोविन्द (आदि)
अंत में, पृथ्वी पर धर्म की रक्षा के लिए वे समय-समय पर अवतार लेते हैं। मुख्य रूप से 10 अवतार (दशावतार) प्रसिद्ध हैं:
मत्स्य, 2. कूर्म, 3. वराह, 4. नृसिंह, 5. वामन, 6. परशुराम, 7. राम, 8. कृष्ण (या बलराम), 9. बुद्ध, और 10. कल्कि।
सारांश:
तत्व की दृष्टि से विष्णु एक हैं, लेकिन सृष्टि प्रक्रिया के लिए तीन और मूर्ति पूजा के विस्तार के लिए चौबीस रूपों में जाने जाते हैं।
क्या आप इन तीनों विष्णुओं के कार्य या किसी विशेष अवतार के बारे में विस्तार से जानना चाहेंगे?
इन तीन विष्णुओं (पुरुष अवतारों) के कार्यों और उनके बीच के सूक्ष्म अंतर को विस्तार से समझते हैं। यह विषय श्रीमद्भागवतम् और अन्य पुराणों में सृष्टि के निर्माण को समझाने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
यहाँ तीनों रूपों का विस्तृत विवरण दिया गया है:
यह भगवान का सबसे विशाल और प्रथम पुरुष रूप है।
निवास: ये आध्यात्मिक और भौतिक जगत के बीच स्थित 'विरजा नदी' या 'कारण सागर' (Causal Ocean) में निवास करते हैं।
कार्य: इनकी महिमा यह है कि ये सिर्फ़ अपनी सांस (Breath) के द्वारा सृष्टि करते हैं।
जब ये सांस बाहर छोड़ते हैं, तो इनके शरीर के रोम-छिद्रों से अनगिनत बुलबुले निकलते हैं, और हर बुलबुला एक 'ब्रह्मांड' बन जाता है।
जब ये सांस अंदर लेते हैं, तो सारे ब्रह्मांड नष्ट होकर वापस इनके शरीर में समा जाते हैं।
विशेषता: इस स्तर पर समय (Time) का अस्तित्व नहीं होता। यह 'मल्टिवर्स' (Multiverse) का आधार है।
महाविष्णु से निकले हुए हर एक ब्रह्मांड के अंदर भगवान एक विस्तार लेकर प्रवेश करते हैं, जिसे गर्भोदकशायी विष्णु कहते हैं।
निवास: ये ब्रह्मांड के आधे हिस्से को अपने पसीने (जल) से भर देते हैं जिसे 'गर्भ सागर' कहते हैं और वहां शेषनाग की शैया पर लेटते हैं।
कार्य: इनकी नाभि से एक दिव्य कमल निकलता है। उस कमल पर ब्रह्मा जी का जन्म होता है।
विशेषता: इन्हीं को हम अक्सर 'पद्मनाभ' कहते हैं। ब्रह्मा जी इन्ही से शक्ति लेकर उस ब्रह्मांड के अंदर ग्रह, नक्षत्र, और जीवों के शरीरों की रचना (Engineering) करते हैं।
यह विष्णु का वह रूप है जो हमारे सबसे करीब है और जिसे हम आमतौर पर पूजते हैं।
निवास: ये ब्रह्मांड के भीतर 'श्वेतद्वीप' (जहाँ क्षीर सागर या दूध का सागर है) में निवास करते हैं।
कार्य:
परमात्मा: ये चींटी से लेकर ब्रह्मा तक, हर जीव के हृदय में 'परमात्मा' (Supersoul) के रूप में बैठते हैं और गवाह के रूप में हमारे कर्मों को देखते हैं।
अणु-प्रवेश: ये सृष्टि के प्रत्येक परमाणु (Atom) के अंदर भी स्थित हैं, जिससे पदार्थ (Matter) बना रहता है।
अवतार: जब भी धरती पर धर्म की हानि होती है, तो यही क्षीरोदकशायी विष्णु अवतार (जैसे राम, कृष्ण, नृसिंह) लेकर आते हैं। देवता जब मदद मांगने जाते हैं, तो वे इन्हीं के पास क्षीर सागर के तट पर जाते हैं।